पावलव का शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत (Pavlov's Classical Conditioning Theory) - संपूर्ण व्याख्या।

पावलव का शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत (Pavlov's Classical Conditioning Theory) - संपूर्ण व्याख्या

शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत सीखने की प्रक्रियाओं (Learning Processes) को समझने के लिए अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं। इन सिद्धांतों में रूसी शरीरशास्त्री और मनोवैज्ञानिक इवान पत्रोविच पावलव (Ivan Petrovich Pavlov) का सिद्धांत अत्यंत युगांतकारी माना जाता है। पावलव का सिद्धांत (Pavlov Theory Of Learning) न केवल मनोविज्ञान बल्कि शिक्षा और व्यवहार संशोधन के क्षेत्र में भी आधारशिला है।

इस सिद्धांत का प्रतिपादन सन् (1904) में किया गया था। आश्चर्यजनक रूप से, पावलव मूल रूप से पाचन क्रिया (Digestion) पर शोध कर रहे थे, जिसके लिए उन्हें 1904 में ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसी शोध के दौरान उन्होंने अनुबंधन (Conditioning) की घटना को देखा और विकसित किया।

पावलव के सिद्धांत के विभिन्न नाम (Different Names of Pavlov's Theory)

पावलव के इस महान सिद्धांत को मनोविज्ञान में उसकी प्रकृति और व्याख्या के आधार पर कई अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। इन नामों को जानना परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  1. अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धांत (Theory of Conditioned Response)
  2. क्लासिकल अनुबंधन सिद्धांत (Classical Conditioning Theory)
  3. शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत
  4. अनुबंधित अनुक्रिया सिद्धांत
  5. प्रतिस्थापन सिद्धांत (Theory of Substitution)
  6. संबद्ध प्रतिक्रिया का सिद्धांत

वास्तव में, **अनुबंधन का सिद्धांत** मूल रूप से शरीर विज्ञान (Physiology) का सिद्धांत है, जिसे पावलव ने मनोविज्ञान में सीखने की प्रक्रिया पर लागू किया। इस **अनुबंधन क्रिया** में "उद्दीपन" (Stimulus) और "प्रतिक्रिया" (Response) के बीच एक नया संबंध (Association) स्थापित करके सीखने पर विशेष बल दिया जाता है।

पावलव के सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या (Explanation of Pavlov's principle)

इस सिद्धांत की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए विद्वानों ने लिखा है कि अनुकूलित अनुक्रिया का अर्थ अस्वाभाविक उत्तेजना (कृत्रिम उद्दीपन) के प्रति स्वाभाविक क्रिया करने से है। जब कोई कृत्रिम उद्दीपन बार-बार स्वाभाविक उद्दीपन के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो मस्तिष्क दोनों के बीच संबंध जोड़ लेता है। अंततः, केवल कृत्रिम उद्दीपन देने पर भी वही स्वाभाविक प्रतिक्रिया होने लगती है।

उदाहरणों से समझने का प्रयास (Let's try to understand by examples)

पावलव के इस जटिल सिद्धांत को हम दैनिक जीवन के सरल उदाहरणों से आसानी से समझ सकते हैं:

उदाहरण 1 (बालक का डर): यदि किसी बच्चे को बार-बार किसी काले रंग की वस्तु या खिलौने के साथ एक डरावनी आवाज़ सुनाई जाए, तो धीरे-धीरे वह बच्चा उस काले रंग को देखते ही डर जाता है। यहाँ काला रंग कृत्रिम उद्दीपन बन जाता है और डरना स्वाभाविक प्रतिक्रिया

उदाहरण 2 (गोलगप्पे): किसी गली से गुज़रते समय गोलगप्पे की दुकान या ठेला देखकर किसी लड़की के मुंह में पानी भर आता है। यह इसलिए होता है क्योंकि उसने अतीत में गोलगप्पे के स्वाद (स्वाभाविक उद्दीपन) का अनुभव किया है और अब केवल दुकान को देखना (कृत्रिम उद्दीपन) ही लार टपकाने के लिए पर्याप्त है।

उदाहरण 3 (शब्दों से चिढ़ना): मान लीजिए कोई व्यक्ति 'तोता राम' कहने से चिड़ता है, तो कोई 'भगत जी' कहने से, और कोई जलेबी की बात से। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चिढ़ने वाले व्यक्ति के जीवन में उस शब्द के साथ कोई ऐसी अप्रिय घटना घटित हो चुकी होती है, जिसकी याद आते ही उसे दुख का अनुभव होता है। उस शब्द के स्मरण मात्र से वह दुख पुनः जाग जाता है और व्यक्ति चिढ़ने लगता है।

उदाहरणों का भावार्थ और व्यवहारवादी दृष्टिकोण

यह सब अचानक ही नहीं होता है, बल्कि इस तरह की भावनाएं और संबंध धीरे-धीरे मन में घर करते हैं। इस प्रक्रिया में पहले जीवन में कोई घटना घटित होती है, उसका कोई विशेष कारण होता है, वह कारण शब्द या वस्तु से जुड़ जाता है और अंततः दुख या सुख की अनुभूति कराता है।

पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि व्यक्ति दुख या सुख का अभ्यास होने के कारण प्रतिक्रिया करने लगता है। चूँकि इस सिद्धांत का मूल आधार परिस्थिति के सापेक्ष व्यवहार (Behavior) है, इसलिए कुछ लोग इसे व्यवहारवादी सिद्धांत (Behaviorist Theory) भी कहते हैं। इस सिद्धांत को मानने वाले मनोवैज्ञानिकों में पावलव, स्किनर (Skinner) तथा वाटसन (Watson) के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। जे.बी. वाटसन ने तो अपने स्वयं के बच्चे 'अल्बर्ट' पर खरगोश के साथ डर का अनुबंधन करके इसे सिद्ध किया था।

पावलव का कुत्ते पर क्लासिकल प्रयोग (Pavlov's Experiment on Dog)

पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत (Classical Conditioning) को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने अपने पालतू कुत्ते पर एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। इस प्रयोग के लिए उन्होंने एक विशेष ध्वनि-रहित (आवाज़ रहित) कक्ष तैयार कराया।

प्रयोग की प्रक्रिया (Experimental Procedure)

  1. कक्ष की तैयारी: कक्ष को बाहरी आवाज़ों से मुक्त रखा गया ताकि कुत्ता केवल पावलव द्वारा दिए गए उद्दीपनों पर ध्यान केंद्रित कर सके।
  2. कुत्ते को बांधना: भूखे कुत्ते को प्रयोग करने वाली मेज के साथ हार्नेस (पट्टों) से बांध दिया गया ताकि वह स्थिर रहे।
  3. निरीक्षण खिड़की: कक्ष में एक तरफी कांच की खिड़की थी, जिसमें से पावलव कुत्ते के व्यवहार को देख सकते थे, लेकिन कुत्ता उन्हें नहीं देख सकता था।
  4. लार का मापन: पावलव ने कुत्ते की लार ग्रंथि (Salivary Gland) का एक छोटा ऑपरेशन करके लार नली को इस प्रकार नियोजित किया ताकि मुंह से टपकने वाली लार (Saliva) स्वतः ही एक कांच की ट्यूब (Tube) में एकत्रित हो जाए। लार की मात्रा को मापने के लिए ट्यूब पर पैमाना लगा था।

प्रयोग के चरण (Steps of the Experiment)

प्रयोग को पावलव ने तीन मुख्य चरणों में संपन्न किया:

चरण 1 (अनुबंधन से पहले): पावलव ने कुत्ते के सामने भोजन (गोश्त का टुकड़ा) रखा। यह स्वाभाविक है कि भोजन की गंध और स्वाद के कारण उसे देखते ही कुत्ते के मुंह से लार टपकने लगी। यह लार कांच की ट्यूब (Tube) में एकत्रित की गई और उसकी मात्रा मापी गई। यहाँ भोजन स्वाभाविक उद्दीपन था और लार टपकना स्वाभाविक प्रतिक्रिया।

चरण 2 (अनुबंधन के दौरान): पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत के इस चरण में उन्होंने भोजन रखने के साथ-साथ एक घंटी (Bell)भी बजाई। उन्होंने सुनिश्चित किया कि पहले घंटी बजे और उसके तुरंत बाद (0.5 सेकंड के भीतर) भोजन दिया जाए। कुत्ते के व्यवहार का निरीक्षण करने पर पाया गया कि इस बार भी कुत्ते के मुंह से बराबर लार टपकना शुरू हो गई। इस युग्मन (Pairing) के प्रयोग को उन्होंने कई दिनों तक, कई बार दोहराया।

चरण 3 (अनुबंधन के बाद): प्रयोग के अंतिम चरण में पावलव ने केवल घंटी (Bell) बजाई, लेकिन खाना नहीं दिया। उन्होंने कुत्ते की प्रतिक्रिया देखी। वह यह देखकर हैरान रह गए कि कुत्ता अब भी पहले की तरह केवल घंटी की आवाज़ सुनकर ही लार टपका रहा है। घंटी बजने और भोजन मिलने के बीच कोई भौतिक संबंध नहीं था, फिर भी कुत्ते ने लार टपकाई। इससे उसने यह निष्कर्ष निकाला कि कुत्ता घंटी की आवाज से अनुबंधित (Conditioned) हो गया है।

प्रयोग के निष्कर्ष और मुख्य तकनीकी शब्द

इस प्रकार, प्रयोग में भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन (Unconditioned Stimulus - UCS) है। घंटी कृत्रिम या अस्वाभाविक उद्दीपन (Conditioned Stimulus - CS) है। लार का टपकना स्वाभाविक अनुक्रिया (Unconditioned Response - UCR) है जब वह भोजन के प्रति हो, लेकिन जब लार केवल घंटी के प्रति टपके, तो वह अनुकूलित अनुक्रिया (Conditioned Response - CR) बन जाती है।

संबंधों की व्याख्या

उद्दीपन (Stimulus) प्रतिक्रिया (Response) अवस्था (State)
भोजन (UCS) लार टपकना (UCR) अनुबंधन से पहले (स्वाभाविक)
घंटी (CS) + भोजन (UCS) लार टपकना (UCR) अनुबंधन के दौरान (युग्मन)
केवल घंटी (CS) लार टपकना (CR) अनुबंधन के बाद (सीखना)

प्रयोग की एक प्रमुख मान्यता यह भी है कि यहाँ दो उत्तेजनाएं (Stimuli) दी जाती हैं: घंटी का बजना तथा भोजन का दिया जाना। ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। अंत में, भोजन नहीं दिया जाता, केवल घंटी बजाई जाती है। परिणाम और अनुक्रिया वही हुई जो भोजन दिए जाने के समय होती थी।

इस तथ्य की व्याख्या करते हुए पावलव ने लिखा है कि जब दो उद्दीपक (स्वाभाविक और अस्वाभाविक) साथ-साथ बार-बार प्रयुक्त किए जाते हैं (पहले नया तथा बाद में मौलिक), तो पहला (नया) भी कालांतर में प्रभावशाली हो जाता है और वही प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है जो मौलिक उद्दीपक करता था। इस प्रकार, पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ, जिसने पूरी दुनिया को सीखने का एक नया नज़रिया दिया।

सिद्धांत के शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)

पावलव का यह सिद्धांत केवल कुत्तों या जानवरों तक सीमित नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका उपयोग बहुत व्यापक है:

  • अच्छी आदतों का निर्माण: शिक्षकों द्वारा छात्रों में समयबद्धता, स्वच्छता और अनुशासन जैसी अच्छी आदतों का निर्माण इस सिद्धांत के माध्यम से अनुबंधन करके किया जा सकता है।
  • भय और संवेगों का निराकरण: बालकों के मन से परीक्षा का डर, अंधेरे का डर या किसी विशेष विषय के प्रति डर को अनुबंधन के द्वारा दूर किया जा सकता है।
  • पशु प्रशिक्षण: सर्कस के जानवरों या पालतू कुत्तों को कठिन करतब सिखाने के लिए केवल इसी **सिद्धांत** का उपयोग किया जाता है। घंटी बजते ही शेर का पिंजरे में जाना इसी का उदाहरण है।
  • भाषा और शब्दावली का विकास: छोटे बच्चों को वस्तु दिखाकर (जैसे 'एप्पल' की फोटो) शब्द (A-P-P-L-E) सिखाना अनुबंधन का ही रूप है।
  • मानसिक चिकित्सा: मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों के व्यवहार को सुधारने के लिए व्यवहार संशोधन तकनीकों (Behavior Therapy) में अनुबंधन का उपयोग किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न - FAQs

प्रश्न: पावलव के सिद्धांत के अन्य नाम क्या हैं?
उत्तर: पावलव के सिद्धांत के अन्य कुछ नाम इस प्रकार हैं: अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत, क्लासिकल अनुबंधन सिद्धांत, अनुबंधित अनुक्रिया सिद्धांत, शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत, और प्रतिस्थापन सिद्धांत।

प्रश्न: उद्दीपन अनुक्रिया का सिद्धांत क्या है?
उत्तर: सीखने की प्रथम आवश्यकता 'उद्दीपक' (Stimulus), दूसरी आवश्यकता 'अनुक्रिया' (Response), तथा तीसरी आवश्यकता 'उद्दीपन-अनुक्रिया में संबंध' (Association) स्थापित होना उद्दीपन अनुक्रिया का सिद्धांत कहलाता है।

प्रश्न: अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धांत किसके अनुकूलन पर बल देता है?
उत्तर: अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धांत "व्यवहारवादी अनुकूलन" पर बल देता है।

प्रश्न: शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत किसने प्रतिपादित किया था?
उत्तर: इवान पत्रोविच पावलव (Ivan Pavlov) ने शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

प्रश्न: क्रिया प्रसूत अनुबंधन का सिद्धांत क्या है?
उत्तर: क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धांत (बी.एफ. स्किनर द्वारा दिया गया) में सीखने की क्रिया को छोटे-छोटे भागों में सक्रिय रूप से सीखा जाता है, जिसमें पुनर्बलन (Reinforcement) महत्वपूर्ण होता है।

प्रश्न: पावलव का पूरा नाम क्या है?
उत्तर: इवान पत्रोविच पावलव नाम है।

प्रश्न: पावलव ने अपने प्रयोग में अस्वाभाविक उद्दीपन किसे बनाया था?
उत्तर: पावलव ने अपने प्रयोग में 'घंटी की आवाज़' को अस्वाभाविक (कृत्रिम) उद्दीपन बनाया था।

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निष्कर्ष

आशा करते हैं कि आपको इस लेख से पावलव का सिद्धांत (Pavlov Theory Of Learning) और अनुबंधन की प्रक्रिया के बारे में कुछ नई और अत्यंत उपयोगी जानकारी प्राप्त हुई होगी। यह सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारे दैनिक व्यवहार, भावनाएं और आदतें किस प्रकार हमारे परिवेश के साथ अनुबंधित होती हैं।

यदि पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत (Pavlov's Theory) लेख के विषय में आपके कोई भी सवाल या जवाब हैं, तो कृपया नीचे

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