अष्टांग योग क्या है? (What is Ashtanga Yog in Hindi)
मानव का लक्ष्य आरम्भ से ही सांसारिक दुःखों से छुटकारा पाकर 'स्वयं' को खोजना रहा है, किन्तु सांसारिक विषय-वासना के मोह जाल में फांसकर प्राणी 'स्वयं' को खोज पाने में असमर्थ रहता है। इन सांसारिक विषय-वासना से छुटकारा पाने के लिए वह विभिन्न मार्गों की शरण में जाता है, किन्तु अविद्या के कारण तथा पुरूष और प्रकृति के पार्थक्य का ज्ञान नहीं रहने के कारण वह स्वयं (आत्मा) को बंधनग्रस्त कर लेता है और मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर पा है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए 'योग मार्ग' सबसे उपयुक्त एवं सरल है। मोक्ष प्राप्ति के लिए तत्व ज्ञान पर अधिक बल दिया गया है और योग के अनुसार तत्व ज्ञान की प्राप्ति तब तक नहीं हो सकती, जब तक मनुष्य विभिन्न सांसरिक विषय वासनाओं में लिप्त है। अतः योग दर्शन से चित्त की स्थिरता प्राप्त करने के लिए चित्तवृत्ति का निरोध करने के लिए योग मार्ग को व्याख्य की गई है।
सरल शब्दों में-
योग का अर्थ योग-दर्शन में चित्त वृत्तियों का निरोध है। आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग ही योग है। योग मार्ग द्वारा समाधि अवस्था में पहुंचे का प्रयत्न किया जाता है। योग दर्शन में योग 'राज योग' भी बताया गया है तथा योग मार्ग के लए आठ सीढ़ियों बतायी गयी हैं।
अष्टांग योग का इतिहास (History of Ashtanga Yoga)
अष्टांग योग का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है, जिसका मूल स्रोत भारतीय दर्शन और योग परंपरा में निहित है। अष्टांग योग की व्यवस्थित व्याख्या सबसे पहले महान ऋषि महर्षि पतंजलि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ योग सूत्र में की थी। यह ग्रंथ लगभग 200 ईसा पूर्व से 400 ईस्वी के बीच लिखा गया माना जाता है और इसमें योग के सिद्धांतों को वैज्ञानिक एवं दार्शनिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
प्राचीन काल में योग की उत्पत्ति
योग का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता तक जाता है, जहाँ खुदाई में ध्यान मुद्रा में बैठे हुए मानव आकृतियों के प्रमाण मिले हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि योग की परंपरा हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है।
पतंजलि और अष्टांग योग का विकास
महर्षि पतंजलि ने योग को एक व्यवस्थित रूप देते हुए “अष्टांग योग” की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने मानव जीवन को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से संतुलित करने के लिए 8 अंगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) का वर्णन किया।
इन आठ अंगों के माध्यम से व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) की ओर अग्रसर होता है।
मध्यकालीन और आधुनिक विकास
मध्यकाल में योग का विकास विभिन्न संतों और योगियों द्वारा किया गया, जिसमें भक्ति और हठयोग का भी प्रभाव देखने को मिलता है। आधुनिक काल में योग को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में स्वामी विवेकानंद का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने पश्चिमी देशों में योग और भारतीय दर्शन का प्रचार-प्रसार किया।
इसके बाद 20वीं शताब्दी में श्री के. पट्टाभि जोइस ने अष्टांग योग को एक विशेष शैली (Ashtanga Vinyasa Yoga) के रूप में विकसित किया, जिससे यह योग पद्धति विश्वभर में लोकप्रिय हो गई।
अष्टांग योग के 8 अंग (8 Limbs of Ashtanga Yoga)
योग को अष्टांग साधन या योग (The Eight Fold Path of Yoga) भी कहा जाता है। ऋषि-मुनियों व योगियों के द्वाराौगी शरीर, मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के ही साधन बताये गये हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहते है। इनमें प्रथम पांच साधनों का सम्बन्ध मुख्य रूप से स्थूल शरीर से है, ये सूक्ष्म से स्पर्श मात्र करते हैं, जबकि बाद के तीनों साधन सूक्ष्म और कारण शरीर का गहरे तक स्पर्श करते हुए उसमें परिष्कार करते हैं। इसलिए प्रथम पांच साधनों यम, नियम, आसन, प्राणायाम व प्रत्याहार को बहिरंग साधन तथा बाद में तीनों साधनों-धारण, ध्यान व समाधि को अंतरंग साधन कहा जाता है अष्टांग योग के ये आठ मार्ग निम्नलिखित हैं -
1. यम (Absention)
यह योग का पहला अंग है, जिसका अर्थ है मन को धर्म में स्थिर रखते हुए तथा बाहरी व आंतरिक इंद्रियों को वश में रखते हुए जीवन यापन करना। अर्थात् इंद्रियों को अपने वश में करने की कला ही यम है। यह के भी 5 अंग माने गए हैं-
- अहिंसा (Non-violence)
- सत्य (Truthfulness)
- अस्तेय (Non-stealing)
- ब्रह्मचर्य (Continence/Chastity)
- अपरिग्रह (Non-possessiveness)
(i) अहिंसा: अहिंसा का अर्थ है कि मन व वचन द्वारा किसी भी प्राणी को आंतरिक व बाहरी रूप के कष्ट न पहुंचाना। अहिंसा दूसरे प्राणियों कर दयाभाव नहीं देती है। योग-दर्शन में हिंसा करने की इजाजत नहीं देती है। योग-दर्शन में हिंसा को समस्त बुराईयों की जड़ माना गया है तथा इसी कारण योग में अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए बल दिया जाता है।
(ii) सत्य : सत्य से अभिप्रायः है सदैव यथास्थिति को उसी के अनुरूप हूबहू प्रस्तुत करना अर्थात जैसा देखा, सुना व मन ने समझा उसको वैसा ही कह देना सत्य की परिधि के अंतर्गत आता है, किन्तु सत्य केवल बाहरी नहीं होना चाहिए अपितु आंतरिक भी होना चाहिए। सत्य प्राणी हित्त से भी जुड़ा होना चाहिए।
(iii) अस्तेय : वह यम का तीसरा नियम है। मन, कर्म व वचन से किसी दूसरे के धन को न कामना न करना ही तथा दूसरे के सत्व को ग्रहण न करना ही अस्तेय है।
(iv) ब्रह्मचर्य : आन्तरिक व बाहरी इन्द्रियों के साथ-साथ विषय-वासना से सम्बन्धित गुप्तेन्द्रियों को वश में करना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है। शरीर से ही नहीं अपितु मन और वाणी से भी यौन सुख की कामना या इच्छा न जगाना ही ब्रह्मवर्ग है। ब्रह्मचर्य यम का चौथा नियम है तथा योग दर्शन में ब्रह्मचर्य को अपनाये जाने पर अत्यन्त बल दिया गया है क्योंकि काम वासना से लिप्त प्राणी कभी भी परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाता है।
(v) अपरिग्रह: यह यम का पांचवां नियम है। व्यक्ति को बिना परिश्रम के ही अचानक अथाह धन व सुख सुविधाओं के प्राप्त होने पर उसका परित्याग करना ही अपरिग्रह करना कहलाता हैं। अपरिग्रह में ददान का भी त्याग किया जाता है। जरूरत से अधिक धन संचय व सुख-सुविध ओं का जुटाना भी अपरिग्रह के विरूद्ध है।
सात्विक जीवन जीने के लिए यम के ये पांचों नियम अत्यन्त उपयोगी है। इन नियमों पर चलकर व्यक्ति स्वयं को परमात्मा के इतने निकट ले आता है कि वह स्वयं को जब चाहे परमात्मा में विलीन कर सकता है। इन पांचों नियमों से व्यक्ति नैतिक व संयमी बनता है तथा बुरे आचरण से स्वयं को बचाये रखता है। वह अपनी इंद्रियों को व कामेच्छा को वश में करना सीख जाता है, जिसके कारण वह योग मार्ग पर बिना बाधा के चलता रहता है।
2. नियम (Observance)
यह योग का दूसरा अंग है। इसके अनुसार सात्विक व सदाचार जीवन पर बल दिया जाता है नियम पांच प्रकार के बताये गये है-
- शौच (Saucha)
- संतोष (Santosha)
- तप (Tapas)
- स्वाध्याय (Svadhyaya)
- ईश्वर प्राणिधान (Ishvara Pranidhana)
(i) शौच: शारीरिक स्वच्छता या शुद्धिकरण से है। इस शुद्धिकरण में आंतरिक व बाहरी स्वच्छता सम्मिलित है। शरीर को संतुलित भोजन, नियमित सफाई व यौगिक क्रियाओं द्वारा स्वच्छ रखा जा सकता है। मन को समस्त विकार जैसे क्रोध, तनाव, द्वेष आदि को बाहर निकाल कर शुद्ध रखा जा सकता है।
(ii) संतोष : जीवन जीने के लिए आवश्यक चीजों की प्राप्ति हो जाने पर स्वयं को अन्य वस्तुओं की लालसा न करने देना संतोष कहलाता है। व्यक्ति यदि संतोष रखता है तो वह स्वयं को परमात्मा के अधिक पास ले जाने से सक्षम रहता है।
(iii) तप : विषम परिस्थितियों में भी शरीर को कार्य करने हेतु सक्षम बनाये रखने तथा गर्मी सर्दी, भूख-प्यास आदि शारीरिक कठिनाईयों की परवाह किये बिनना अपने लक्ष्य की तरफ निरन्तर बढ़ते जाना ही तप है। तप से परमात्मा व आत्मा के रहस्य को जानने में मदद मिलती है। योग-दर्शन में भी 'तप' पर विशेष ध्यान दिया गया है।
(iv) स्वाध्याय : जीवन रूपी पथ पर धर्म ग्रन्थों का तथा सत्संग व उच्च विचारों का नियमपूर्वक अभ्यास ही स्वाध्याय कहलाता है। स्वाध्याय से व्यक्ति ज्ञान के मार्ग की ओर अग्रसर रहता है।
(v) ईश्वर प्राणिधान : ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा व अटूट विश्वास अत्यन्त आवश्य है। मन, कर्म व वचन से परम तत्व की प्रार्थना, स्तुति-गुणगान करने से प्राणी स्वयं ही ईश्वर के काफी समीप ले आता है। स्वयं को भूलाकर उस परमपिता में लीन हो जाना ही 'ईश्वर प्राणिधान' है। ईश्वर प्राणिधान से व्यक्ति निर्भय व चरित्रवान बनता है।
3. आसन (Postures)
योग का तीसरा अंग आसन है। महर्षि पंतजलि ने आसन को 'तंत्र स्थिर सुखमासनम्' बताया है, अर्थात् वह स्थिति है. जिसमें शरीर व आत्मा दोनों स्थिर हो। ध्यान की स्थिति में यदि शरीर को कष्ट की अनुभूति हो तो ध्यान सार्थक नहीं हो सकता। इसलिए आसन पर जोर दिया गया है। आसन से नाड़ियों की शुद्धि, शरीर व मन को स्फूर्ति मिलने के साथ-साथ शरीर बाहरी व आंतरिक रूप से मजबूत व स्वस्थ बनता है।
आसन के तीन रूप ध्यानात्मक, आसन, व्यायात्मक आसन व आरामदायक आसन करने से व्यक्ति का पूर्ण शरीर पर नियंत्रण स्थापित हो जाता है। शरीर के सभी अंग मुख्यतः स्नायुमंडल पूर्ण रूप से वश में हो जाता है। यम, नियम का ज्ञान रखने वाला ही आसन का अभ्यास कर लाभ उठा सकता है। चित्त की एकाग्रता के लिए शरीर के अनुशासन का पालन करना होता है। इस अनुशासन के लिए ही आसन का विशेष महत्व है।
4. प्राणायाम (Breath Control)
यह योग का चौथा अंग है। प्राणायाम का शब्दिक अर्थ है- 'प्राण का संयम करना।' अर्थात् श्वास प्रक्रिया को नियंत्रित करके उसमें एक क्रम लाना प्राणायाम कहलाता है। जब हम श्वास को भीतर खींचते हैं तथा बाहर की प्राण वायु को फेफड़ों में भरते हैं तो वह श्वास कहलाता है तथा जब फेफड़ों से अशु वायु बाहर निकालते हैं तथा सांस छोड़ते हैं तो वह प्रश्वास कहलाता है। अतः प्राणायाम को श्वास-प्रश्वास को गति को नियंत्रित व संतुलित करने वाला भी माना जाता है। प्राणायाम समाधि में पूर्णतः लाभकारी सिद्ध होता है। प्राणायाम के तीन भेद है-
- पूरक
- कुम्भक
- रेचक
(1) पुरक : पूरक में गहरी सांस ली जाती है।
(2) कुम्भक : कुम्भक में सांस को भीतर रोक कर रखा जाता है।
(3) रेचक: रेचक में सांस को धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है। रेचक का अर्थ ही होता है श्वास छोडना व इसे नियमित करना।
प्राणायाम को उद्देश्य शरीर में व्याप्त प्राण शक्ति को उत्प्रेरित संचारित नियंत्रित व संतुलित करना है। इससे हमारा शरीर तथा मन नियंत्रण में आ जाता है एवं मन की सही निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है। मन की चंचलता दूर हो जाती है, मन एकाग्रचित्त हो जाता है तथा मन व इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने में मदद मिलती है।
'व्यास भाष्य' में प्राणायाम को सब तपों में श्रेष्ठतम बताया गया है कि इससे समस्त मल व विकार मिट जाते है और ज्ञान का विकास होता है। मनु ने भी 'प्राणायाम' की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा है कि जैसे अग्नि से धाँके हुए स्वर्ण आदि के धातुओं के समस्त गल नष्ट हो जाते हैं. उसी प्रकार प्राणायाम करने से इन्द्रियों के मल नष्ट होते हैं।
महर्षि पंतजलि ने प्राणायाम को ऐच्छिक साधन के रूप में स्वीकार किया है किन्तु फिर भी समूचे योग-दर्शन में प्राणायाम को योग के आवश्यक साधन के रूप में स्वीकार किया गयया है।
5. प्रत्याहार (Sense Control)
प्रत्याहार योग का पाँचवाँ अंग है। प्रत्याहार, प्रति+आहार दो शब्दों के मेल से बना है। अर्थात इन्द्रियों को विषय-वासनना से दूर रख नियंत्रण में रखना ही प्रत्याहार है। प्रत्याहार में इन्द्रियों को बाहरी, विषय-वासनाओं से दूर कर उन्हें अन्तर्मुखी बनाया जाता है। प्रत्याहार कौक सिद्ध से साधक को इंद्रियों पर अधिकार, मन की शुद्धता, तप की वृद्धि, शारीरिक स्वास्थ्य एवं समाधि में प्रवेश करने की क्षमता प्राप्त होती है।
प्रत्याहार को अपनाया जाना बहुत मुश्किल है किन्तु निरन्तर अभ्यास एवं इंद्रियों के निग्रह के द्वारा ही प्रत्याहार को अपनाया जा सकता है।
6. धारणा (Fixsing the Mind on a Particular Object)
धारणा योग का छठा अंग है। धारणा का शाब्दिक अर्थ है -' धारण करना'। जब मन किसी विषय को धारण करने की योग्यता प्राप्त कर लेता है तथा कुछ देर तक स्वयं ही उसी अवस्था में स्थिर रख सकने की योग्यता धारणा कहलाती है। अर्थात् आध्यात्मिक दिशा या परमत्व की तरफ मन को लगा देना ही धारणा है। यम, नियम, आसन व प्राणायाम आदि के उचित अभ्यास से धारणा को प्राप्त किया जा सकता है।
धारणा में मन किसी एक विषय पर केंद्रित हो जाता है तथा इस अवस्था में मन बिल्कुल शांत, स्थिर व एकाग्र हो जाता है। ऐसी अवस्था में समस्त विषय-वासनाओं का आदान-प्रदान रूक जाता है। ऐसी अवस्था में समस्त विषय-वासनाओं का आदान-प्रदान रूक जाता है। मन केवल एक ही वस्तु पर केंद्रित हो जाता है। धारणा के पथ पर चलते हुये ध्यान एव समाधि के मार्ग तक पहुँचने में सफलता प्राप्त हो सकती है।
7. ध्यान (Meditation)
ध्यान योग का सातवां अंग है। ध्यान का अर्थ है मन को किसी विषय में बिना किसी बाहरी व अंदरूनी अवरोध के लगाये रखना। दूसरे शब्दों में हम यूं भी कहक सकते हैं कि ध्यान, धारणा व परिपक्व व संतुलित रूप है। ध्यान को वर्तमान में जीने को रूप में भी लिया जा सकता है। वर्तमान में रहकर जीवन बिताते हुए मन की चंचलता समाप्त कर उसमें एकाग्रता लायी जाती है तथा मानसिक शक्ति को परिपक्व बनाया जाता है।
8. समाधि (Concentration)
समाधि योग का अन्तिम अंग है। समाधि वह अवस्था है, जब साधक अपनी लगन या भक्ति में इतना लीन या खो जाता है कि उसे स्वयं का भी बोध नहीं रहता तथा वह केवल अपने आराध्य में ही लीन हो जाये। अर्थात् मन को समस्त विषय-वासनाओं से हटाकर एकाग्र करना ही समाधि है। समाधि ध्यान की चरमावस्था है। जब साधक अपने ध्यानावस्था को प्राप्त कर लेता है, तब वही से वह समाधि में प्रवेश कर जाता है। उस अवस्था में उसे केवल अपना आराध्य ही नजर आता है। आराध्यक्ष में ही तल्लीन होने से समाधि की अवस्था प्राप्त होती है और इस अवस्था में पहुंचकर साधक अपपनी अंतिम मंजिल को प्राप्त कर लेता है। आत्मा व परमात्मा का मिलन इसी अवस्था का परिणाम है।
धारणा, ध्यान और समाधि तीनों का योग का अंतरंग साधन (Internal Means) कहा जाता है। इन तीनों का उद्देश्य एवं विषय एक ही रहता है। अर्थात् एक विषय को लेकर मन में धारणा होती हैं फिर उस धारणा में ध्यान लगाया जाता है तथा अन्त में ध्यान के चरमोत्कर्ष पर पहुंचने से समाधि का मार्ग प्रशस्त होता है। इन तीनों का मिलन संयम कहलाता है। समाधि के दो सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि भेद माने गए हैं
सम्प्रज्ञाम समाधि के भी निम्न भेद स्वीकार किये गये हैं-
- सवितर्क समाधि
- सविचार समाधि
- सानन्द समाधि
- अस्मिता समाधि
उपरोक्त अष्टांग मार्ग के आठों साधनों के मार्ग पर चलकर साधक स्वयं को परमात्मा में लीन कह सकता है तथा मोक्ष प्राप्ति भी इसी मार्ग से होकर ही संभव है। प्राणी इन्हीं अष्टांग मार्ग पर चलकर स्वयं को जान सकता है तथा अपने जीवन के अंतिम व सच्चे लक्ष्य को भी प्राप्त कर सकता है।
अष्टांग योग के लाभ (Benefits of Ashtanga Yoga in Hindi)
अष्टांग योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के समग्र विकास की एक प्रभावी पद्धति है। महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए इस योग के 8 अंग व्यक्ति को अनुशासित, स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने में मदद करते हैं।
महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए अष्टांग योग के प्रमुख लाभ ।- शरीर मजबूत और लचीला बनता है।
- मांसपेशियों की शक्ति (Muscle Strength) बढ़ती है।
- शरीर का संतुलन (Balance) बेहतर होता है।
- रक्त संचार (Blood Circulation) सुधरता है।
- मोटापा नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
- तनाव (Stress) और चिंता (Anxiety) कम होती है।
- मानसिक शांति (Mental Peace) प्राप्त होती है।
- मन एकाग्र (Concentration) होता है।
- स्मरण शक्ति (Memory) बढ़ती है।
- आत्म-नियंत्रण (Self-control) और अनुशासन विकसित होता है।
- सकारात्मक सोच (Positive Thinking) बढ़ती है।
- प्राणायाम से श्वसन प्रणाली (Respiratory System) मजबूत होती है।
- फेफड़ों की क्षमता (Lung Capacity) बढ़ती है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) मजबूत होती है।
- बीमारियों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है।
- आत्म-जागरूकता (Self-awareness) बढ़ती है।
- आध्यात्मिक विकास (Spiritual Growth) होता है।
- नींद की गुणवत्ता (Sleep Quality) में सुधार होता है।
- जीवनशैली (Lifestyle) बेहतर बनती है।
- कार्यक्षमता (Productivity) बढ़ती है।
अष्टांग योग के नियम (Rules of Ashtanga Yoga)
| श्रेणी | नियम | विवरण |
|---|---|---|
| सामान्य नियम | नियमित अभ्यास | योग का अभ्यास रोज़ करना चाहिए |
| सामान्य नियम | खाली पेट अभ्यास | योग हमेशा खाली पेट करना चाहिए |
| सामान्य नियम | शांत स्थान | शांत और स्वच्छ वातावरण में योग करें |
| सामान्य नियम | आरामदायक कपड़े | ढीले और आरामदायक कपड़े पहनें |
| यम | अहिंसा | किसी को नुकसान न पहुँचाना |
| यम | सत्य | सत्य बोलना |
| यम | अस्तेय | चोरी न करना |
| यम | ब्रह्मचर्य | इंद्रियों पर नियंत्रण |
| यम | अपरिग्रह | अधिक संग्रह न करना |
| नियम | शौच | शरीर और मन की शुद्धता |
| नियम | संतोष | संतुष्ट रहना |
| नियम | तप | अनुशासन और परिश्रम |
| नियम | स्वाध्याय | आत्म अध्ययन |
| नियम | ईश्वर प्राणिधान | ईश्वर में आस्था |
| अभ्यास नियम | सही विधि | योग सही तरीके से करें |
| अभ्यास नियम | आराम | योग के बाद विश्राम करें |
| अभ्यास नियम | सांस पर ध्यान | प्राणायाम में श्वास नियंत्रण रखें |
| अभ्यास नियम | सुबह का समय | सुबह योग करना सबसे लाभदायक है |
अष्टांग योग कैसे करें? (How to Practice Ashtanga Yoga)
महर्षि पतंजलि के अनुसार अष्टांग योग करने के आसान स्टेप्स
- शांत, स्वच्छ और हवादार स्थान का चयन करें।
- सुबह के समय (खाली पेट) योग करना सबसे बेहतर होता है।
- अभ्यास से पहले हल्का वार्म-अप (Warm-up) करें।
- शरीर को धीरे-धीरे स्ट्रेच करें ताकि चोट न लगे।
- यम और नियम का पालन करें।
- अपने व्यवहार में अनुशासन और सकारात्मकता रखें।
- सरल आसनों (Asana) से शुरुआत करें।
- धीरे-धीरे कठिन आसनों की ओर बढ़ें।
- प्राणायाम (Pranayama) का अभ्यास करें।
- गहरी और नियंत्रित श्वास लेने की आदत डालें।
- प्रत्याहार (Pratyahara) का अभ्यास करें।
- इंद्रियों को बाहरी चीजों से हटाकर मन को अंदर की ओर केंद्रित करें।
- धारणा (Dharana) का अभ्यास करें।
- किसी एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें।
- ध्यान (Dhyana) करें।
- मन को शांत और स्थिर बनाएं।
- नियमित अभ्यास बनाए रखें।
- अपनी क्षमता के अनुसार ही योग करें, जबरदस्ती न करें।
- अभ्यास के अंत में विश्राम (Relaxation) जरूर करें।
अष्टांग योग और पतंजलि योग का संबंध
अष्टांग योग और पतंजलि योग एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, क्योंकि महर्षि पतंजलि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ योग सूत्र में योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करते हुए अष्टांग योग की अवधारणा दी है। पतंजलि योग मुख्य रूप से योग के दार्शनिक और सैद्धांतिक पक्ष को समझाता है, जिसका उद्देश्य “चित्त वृत्ति निरोध” अर्थात मन को नियंत्रित करना है, जबकि अष्टांग योग उसी सिद्धांत को व्यवहारिक रूप में लागू करने की एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें योग को आठ अंगों—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—में विभाजित किया गया है। इस प्रकार, अष्टांग योग को पतंजलि योग का व्यावहारिक रूप कहा जा सकता है, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार और मानसिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक संतुलन की ओर अग्रसर करता है।
अष्टांग योग और आधुनिक जीवन में इसका महत्व
महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए अष्टांग योग का आधुनिक जीवन में विशेष महत्व 👇
- आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में तनाव (Stress) कम करने में मदद करता है।
- मानसिक शांति (Mental Peace) और भावनात्मक संतुलन बनाए रखता है।
- डिजिटल युग में बढ़ती एकाग्रता की कमी (Lack of Focus) को सुधारता है।
- पढ़ाई और कार्यक्षमता (Productivity) बढ़ाने में सहायक है।
- लंबे समय तक बैठने वाली जीवनशैली (Sedentary Lifestyle) के कारण होने वाली समस्याओं को कम करता है।
- शरीर को लचीला (Flexible) और मजबूत बनाता है।
- अनियमित दिनचर्या को सुधारकर अनुशासित जीवन (Disciplined Life) अपनाने में मदद करता है।
- अच्छी आदतों का विकास करता है।
- नींद की समस्या (Sleep Disorder) को कम करता है।
- गहरी और बेहतर नींद (Quality Sleep) प्रदान करता है।
- चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) जैसे मानसिक समस्याओं में लाभदायक।
- सकारात्मक सोच (Positive Thinking) को बढ़ाता है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को मजबूत बनाता है।
- शरीर को बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाता है।
- आत्म-जागरूकता (Self-awareness) और आत्म-नियंत्रण बढ़ाता है।
- व्यक्ति को बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
- आध्यात्मिक विकास (Spiritual Growth) में सहायक।
- जीवन में संतुलन और संतोष की भावना विकसित करता है।
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अष्टांग योग से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)
अष्टांग योग क्या है?
अष्टांग योग महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित एक प्राचीन योग पद्धति है, जिसमें 8 अंगों के माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास किया जाता है।
अष्टांग योग के कितने अंग होते हैं?
अष्टांग योग के कुल 8 अंग होते हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
अष्टांग योग का जनक कौन है?
अष्टांग योग के जनक महान ऋषि महर्षि पतंजलि माने जाते हैं, जिन्होंने 'योग सूत्र' में इसकी व्याख्या की है।
अष्टांग योग का मुख्य उद्देश्य क्या है?
अष्टांग योग का मुख्य उद्देश्य 'चित्त वृत्ति निरोध' (मन की चंचलता को रोकना) और अंततः आत्म-साक्षात्कार या मोक्ष प्राप्त करना है।
क्या अष्टांग योग रोज करना चाहिए?
हाँ, अष्टांग योग का नियमित अभ्यास करने से ही शारीरिक मजबूती, मानसिक शांति और एकाग्रता प्राप्त होती है।
