निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test) - अर्थ, परिभाषा, महत्त्व, उद्देश्य एवं विशेषताएं।

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 निदानात्मक परीक्षण का अर्थ ( Definition of Diagnostic Test)

निदान शब्द का प्रयोग साधारणतः चिकित्सा के क्षेत्र में अधिक किया जाता है। जब हम किसी डॉक्टर के पास अपने इलाज के लिए जाते हैं तो सबसे पहले वह रोग का निदाना (Diagnos) ही करता है और उसके पश्चात् ही निदान के अनुरूप रोगी की चिकित्सा करता है। इस प्रकार रोगी की चिकित्सा पूर्ण रूप से डॉक्टर के द्वारा किये गये रोगी के निदान पर ही निर्भर करती है। यदि डॉक्टर रोगी का सही निदान करने में सफल होता है तभी उसके द्वारा की जा रही चिकित्सा से रोगी लाभान्वित हो पाता है अन्यथा नहीं। इसी प्रकार अध्यापक भी छात्रों की शैक्षिक प्रगति को जानने और छात्रों की कमजोरियों का पता लगाने के लिए इसके कारणों का पता लगाने का प्रयास करता है। छात्रों की इन कमजोरियों का पता लगाना ही निदान कहलाता है। इसके लिए अध्यापकों को निदानात्मक परीक्षणों की सहायता लेनी होती है। इन परीक्षणों से अध्यापक छात्रों के बारे में यह जानने का प्रयास करते हैं कि अमुक छात्र को अमुक विषय को पढ़ने में क्या कठिनाइयाँ महसूस हो रही हैं और इन कठिनाइयों की ध्यान में रखते हुए ही वह छात्रों को शिक्षित करने का प्रयास करता है। निदानात्मक परीक्षणा के अर्थ एवं स्वरूप को स्पष्ट करते हुए योकम और सिम्पसन ने कहा है, "निदानात्मक परीक्षण वह साधन है जो शिक्षाविदों द्वारा छात्रों की कठिनाइयों को ज्ञात करनी और यथासम्भव उन कठिनाइयों के कारणों को व्यक्त करने के लिए निर्मित किये जाते हैं।

निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test) - अर्थ, परिभाषा, महत्त्व, उद्देश्य एवं विशेषताएं।


निदानात्मक परीक्षण की परिभाषा (Definition of Diagnostic Test)

क्रो एंड क्रो ने निदानात्मक परीक्षण के विषय में लिखा है कि "निदानात्मक परीक्षाणा का निर्माण छात्रों की सीखने सम्बन्धी विशिष्ट कठिनाइयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाता है।"

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है निदानात्मक परीक्षणों का मुख्य ध्येय छात्रों की अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों का पता लगाना होता है।

निदानात्मक परीक्षण की विशेषताएँ(Characteristics of Diagnostic Examination) 


निदानात्मक परीक्षण की निम्न प्रमुख विशेषताएँ हैं- 

(1) निदानात्मक परीक्षणों में उपलब्धि (Achievement) परीक्षणों की भाँति छात्रों को अंक नहीं दिये जाते बल्कि यह ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है कि छात्रों ने कौन से प्रश्न नहीं किये अथवा कौन से प्रश्नों का उत्तर ही नहीं दिया है। इसके बाद इन सही ना किये गये प्रश्नों का विश्लेषण कर वह ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है कि अमुक छात्र ने किसा विषयवस्तु से सम्बन्धित प्रश्न सही नहीं किये हैं अथवा प्रश्न हल ही नहीं किये हैं और इसी के आधार पर छात्र की कमजोरी का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। 

(2) निदानात्मक परीक्षणों में समय की कोई सीमा नहीं होती। छात्र अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार प्रश्नपत्रों को हल करने में कितना भी समय ले सकते हैं। 

(3) निदानात्मक परीक्षण के पश्चात् उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था रहती है। निदानात्मक परीक्षणों के लिए उपचारात्मक शिक्षण का विशेष महत्व है।

(4) निदानात्मक परीक्षणों का क्षेत्र बहुत सूक्ष्म होता है क्योंकि इनके द्वारा किसी बालक की विशिष्टता अथवा कमजोरी को पता लगाने का प्रयास किया जाता है।

(5) निदानात्मक परीक्षण लेने से पहले शिक्षकों को छात्रों के वातावरण, हीन भावना, मन्द बुद्धि, शारीरिक दोष आदि उन कारणों का पता होता है जिनमें छात्रों को सीखने, की प्रक्रिया में कठिनाई हो रही होती है। ऐसा करने के लिए शिक्षक को छात्र की निदानात्मक परीक्षा लेने से पहले योग्यता परीक्षा लेनी होती है। इस परीक्षा से कमजोर छात्रों का सरलता से पता लग जाता है।

(6) निदानात्मक परीक्षणों में पहले सरल प्रश्नों को पूछा जाता है और फिर शनैः-शनैः कठोर और जटिल प्रश्नों की ओर बढ़ा जाता है।

निदानात्मक परीक्षण के उद्देश्य (Aims of Diagnostic Test)



बुनकर व मेलवी ने नैदानिक परीक्षणों का प्रमुख उद्देश्य किसी विषयवस्तु में बालक की विशिष्ट कमजोरी का पता लगाना बताया है जिससे इस कमजोरी के कारणों की छानबीन कर उपचारात्मक कदम उठाये जा सकें। इसके अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने भी निदानात्मक परीक्षण के कुछ उद्देश्य निर्धारित किये हैं जिनमें से प्रमुख हैं-

(1) विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले विषयों की अध्यापन प्रक्रिया में सुधार लाना नैदानिक परीक्षणों का एक प्रमुख उद्देश्य है। 

(2) उपचारात्मक अध्ययन की दिशा को निर्धारित करना निदानात्मक परीक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य है। 

(3) किसी अध्यापन सम्बन्धी प्रक्रिया में पद्धतिगत सुधार हेतु सुझाव देना निदानात्मक का उद्देश्य है।

(4) अध्यापन प्रक्रिया में सीखने के अनुभव और सीखने की प्रक्रिया में रुकावट पैदा करने वाले तत्वों का पता लगाकर उनको दूर करने के उपाय सुझाना निदानात्मक परीक्षणों का उद्देश्य है।

(5) विशेष विशेष या अनुभव में पिछड़े हुए बालकों का पता लगाकर उनके उपचार के लिए सुझाव देना निदानात्मक परीक्षणों का एक प्रमुख उद्देश्य है।

 निदानात्मक परीक्षणों का महत्व (Importance of Diagnostic Test)

आधुनिक शिक्षाविद् और मनोवैज्ञानिक बालक को ही शिक्षा का केन्द्र मान रहे हैं। उनका मानना है कि छात्रों की शिक्षा की व्यवस्था उनकी रुचियों, अभिरुचियों, शारीरिक व मानसिक योग्यताओं को ध्यान में रखकर ही सम्पन्न की जानी चाहिए। इस अर्थ में बालक का शैक्षिक प्रक्रिया में विशेष महत्व हो जाता है। निदानात्मक परीक्षणों के द्वारा हम बालकों की कमजोरियों का पता लगाकर और उसके अनुरूप उपचार सुझाकर उनकी शैक्षिक प्रक्रिया सुचारु रूप से चला सकते हैं। निदानात्मक परीक्षण कमजोर बच्चों की प्रगति की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण व उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। बालक की कमजोरियों का पता लगाये बिना हम उसकी शिक्षा को सही ढंग से नहीं चला सकते। इस अर्थ में निदानात्मक परीक्षण बहुत ही महत्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं। बच्चों की कमजोरियों का पता लगा लेने के पश्चात् उपचारात्मक शिक्षण के माध्यम से उन्हें सही दिशा प्रदान करने में निदानात्मक परीक्षाएँ महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

डी. सी. रावत के अनुसार, "निदानात्मक परीक्षाएँ व्यक्ति की जाँच करने के उपरान्त किसी एक अथवा अधिक क्षेत्र में उसकी विशेषताओं और कमजोरियों को अभिव्यक्त करती हैं।" रामनारायण अग्रवाल का मानना है कि "नैदानिक परीक्षण एक अथवा अनेक क्षेत्रों में छात्रों की कमियों तथा उसकी शक्ति का बोध कराते हैं। ये परीक्षण शिक्षक को यह निश्चित करने में सहायता करते हैं कि उनके द्वारा दिया गया शिक्षण कहाँ तक सफल या असफल हुआ है । "

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